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Gajanan Pandey

Tragedy

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Gajanan Pandey

Tragedy

मजबूर

मजबूर

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पेट का सब खेल है

घर छूटता है

गांव से नाता टूटता है

मन में आस लिए

आदमी शहर आता है।


महज इतना सा ख्वाब है

दो वक्त की रोटी हो

सिर ढकने को छत हो।

हाथों में काम हो

कल भी न बेकार हो।


पर कल किसने देखा है ?

वक्त के आगे

सब बेबस हैं

मजबूर

फिर घर की ओर लौटने को ।


आज मजदूर है मजबूर

कल की आस में

चला आया था शहर की ओर

पर सपने रह गये अधूरे

और आज वह मजबूर है

फिर घर लौट जाने को ।


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