मिट्टी की देवी
मिट्टी की देवी
मिट्टी के मुखौटों में सजती हूँ,
तुम आदर का भाव सजाते हो!
पत्थर के साँचों में ढलती हूँ,
तुम भक्ति की भेंट चढ़ाते हो!
शेरों वाली माता कहकर,
जगदंबा, आदिशक्ति बनाते हो!
पर स्त्री रूप जो है घर घर में,
छलनी तन-मन कर जाते हो!
नौ दिन का सम्मान चढ़ाकर,
नारी अबला कह जाते हो!
मानव तेरा खेल निराला,
मिट्टी की मूरत में देवी का
रुप श्रृंगार सजाते हो!
घर में बैठी है जो देवी स्वरूपा,
उसे तार तार कर जाते हो !
कन्या पूजन कर धोते हो चरण,
फिर चरणामृत पी जाते हो!
और घर की निर्भया की अस्मिता पर,
वहशी तलवार चलाते हो!
मिट्टी की देवी पर अपने,
भक्ति भाव लुटाते हो !
फिर मर्यादा की हत्या कर,
पशुता तक उतरे जाते हो!
पर हे मानस के पुरुष अंश,
ये दोगलापन कैसे कर पाते हो!
