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Dr.Narendra kumar verma

Romance

4  

Dr.Narendra kumar verma

Romance

महक

महक

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महक उठी है सांसों में, 

मौसम की बहार बनकर,

खुशबू जैसे फूलों की,

हंसी प्रवाह बनकर !

    चहचहाती हुई फूलों पर ,

    तितलियों का आसमान बनकर,

    सिमटती पंखुड़ियों में रसिका,

    खूबसूरती की पहचान बनकर!

पग-पग पर मचलता दिल,

बादलों सी कदमताल बनकर,

सरस होता जैसे समां, 

अवसर की मुलाकात बनकर!

     सरसरी निगाहें बसी आंखों में,

     उठती पलकें एक सवाल बनकर, 

     सुलभ होती प्रदर्शिका, 

     होंठों की मुस्कान बनकर !

पहन करती प्रफुल्ल सुंदर अंगिका,

वृक्षों की छांव बनकर, 

संभल-संभल करती है परिधान,

सिमटती हुई एहसास बनकर!


      


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