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Bhavna Thaker

Tragedy

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Bhavna Thaker

Tragedy

महिला दिवस मनाने की जरूरत नहीं

महिला दिवस मनाने की जरूरत नहीं

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तम घिरे रास्तों पर अपने वजूद को ढूँढते, 

समय के पहियों से कदम मिलाते चली जाती है कुछ एक स्त्रियाँ, 

जीने को चंद पल तरसती छटपटाती है, उम्र के मोड़ पर मिलते है मजमे अनंत पर,

ज़िंदगी से उसकी मुलाकात कभी होती नहीं।


कहाँ बनी कोई खुशी उसके हिस्से की शराबी, कबाबी सरताजों के हाथों रौंदी जाती है,

बेबसी की धूप में खड़ी अक्सर बरगद की छाँह का इंतज़ार करती है ऐसी नारी, 

नहीं मिलती कोई हरी शाख वनिता को

ताज़िंदगी खूंटे से बँधी पाई जाती है।


न चाँद बना कोई उसके हिस्से के आसमान का,

न आदित उगा उसकी भोर का अंधेरों से जूझते ज़ीस्त कटी 

न कोई मोगरा खिला उर आँगन प्रीत का, न चाहत की चाशनी चखी

लकीरें बाँझ ही, रही न किस्मत की कभी देहरी खुली।  


मर्दों की बनाई दंभ से सजी दुनिया का महज़ मोहरा है वो योषिता,

हवस भरी निगाहों में सदा तुलती रहती है, 

छलती रही, जलती रही पग-पग अग्निपरीक्षा देते थक सी गई, 

दाह लिए दिल पर थाह देते अपनों के ही हाथों लूटती रही।


आह्वान करती है अपनों के लिए खुशियों का, खुद के लिए दर्द के काँटे चुनती है,

बोती है जिनके लिए बीज हँसी के 

उसी के हाथों गम की गठरी पाती है,

कितनी संजिदगी से ज़िंदगी की चुनौतियों में ढल जाती है

वार करना चाहे भी तो हथियार कहाँ उठा पाती है 

मोहताज होती है दमनकारी बाशिंदों की।


जीवन संध्या की बेला पर अपनी शक्ल तक भूल जाती है,

छोटी सी खिड़की खोल दो न कोई इनकी आज़ादी की,

अहसान होगा बड़ा अहसान,

जरूरत नहीं महिला दिवस मनाने की।



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