मेरी स्वप्नसुंदरी...।
मेरी स्वप्नसुंदरी...।
जब भी,
कभी गहरी सांस ली,
ठंडक महसूस हुई,
चेहरा मुस्कराया,
मानो उसको छुआ,
बोलो मेरी स्वप्नसुंदरी.....
तकिये पर लेटा,
एक सुखद एहसास हुआ,
जैसे उसको बांहों में भरा,
दो धड़कनें एक हुई,
प्यार की हवाएं चली,
बोलो मेरी स्वप्नसुंदरी.....
जब कभी,
बहुत महकी खुशबू आई,
शरीर के अंदर तक गई,
मैं आनंद विभोर हो उठा,
दो जिस्म एक हो गए,
ऐसा लगा,
बोलो मेरी स्वप्नसुंदरी...
कोई खिलखिलाकर हंसा,
मैं चौका,
नजरें चारों तरफ गई,
मुझे तुम्हारी हंसी लगी,
सारे ग़म तुरंत भूल गया,
तुम मेरे साथ हो,
एहसास हुआ,
बोलो मेरी स्वप्नसुंदरी...
कोई कली खिली देखता,
तुम्हारा और मेरा,
बचपन से जवानी,
तक का सफर,
होंठों पर आ गुंजता,
तुम्हें देख,
मैं अक्सर होश खो जाता था,
और तुम खंगार कर,
वापस चेतना में ले आती थीं,
बोलो मेरी स्वप्नसुंदरी...
