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Shraddha Gauhar

Classics

4.4  

Shraddha Gauhar

Classics

मेरी रसोई

मेरी रसोई

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मेरी रसोई… बस एक जगह नहीं है।
ये… मेरे जज़्बातों की पोटली है।
यहीं मैंने खुद को टूटते देखा है,
और… हारकर भी फिर से जुड़ते देखा है।
ये गवाह है—
उन आँसुओं की,
जो मैंने छुपा दिए थे…
प्याज़ की परतों में।
कई रातों में,
जब बदन बुखार से जल रहा था,
तब भी मैंने… इसे संवारा है।
और इसने—
मुझे संभाला है।
ये जानती है…
मैं कितनी ज़िद्दी हूँ।
कितने तानों को…
मैंने यहीं आकर भुलाया है।
जब कभी पति से झगड़ बैठती हूँ,
तो एक कप चाय में…
इसने मुझे फिर से मनाया है।
जब मेरी परवरिश पर सवाल उठे,
तो इसी ने धीरे से कहा—
“हर रोज़…
तुमने उन्हीं के लिए खाना बनाया है…”
छोटी-छोटी खुशियाँ भी,
यहीं से गुज़री हैं—
हलवे की खुशबू बनकर…
सीधे दिल तक पहुँची हैं।
कभी आटे का केक,
तो कभी अधूरी सी मिठास—
पर हर बार…
इसने परिवार को साथ लाया है।
ये जगह नहीं है…
ये मेरा हिस्सा है।
मैं इसमें बसती हूँ—
और ये… मुझमें।
जब-जब कुछ खास पकाया,
माँ की याद आई…
हर नमकीन में,
पापा की मुस्कान दिखाई दी।
और जब कुछ कम पड़ गया,
तो भाई-बहन का प्यार…
अपने आप बढ़ गया।
हज़ार बार जली हूँ,
कई बार उँगली कटी है—
पर हर दर्द ने…
मुझे मेरी ताकत याद दिलाई है।
तो सुन लो—
इस घर में सब कुछ बाँट लेना…
पर ये रसोई…
मेरे हिसाब से रहने देना।
क्योंकि यहाँ रखी हर चीज़—
मेरी मेहनत से सजी है।
ये सिर्फ एक कमरा नहीं…
ये… मेरी ज़िंदगी की कमाई है।


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