STORYMIRROR

Pushpa Srivastava

Tragedy

3  

Pushpa Srivastava

Tragedy

मेरी प्रकृति माँ

मेरी प्रकृति माँ

1 min
464

उस सुंदर सुबह के उगने की चाह में

प्रकृति माँ रोज करती यहाँ इंतजार

सदियों से बिछे हैं कांटे मेरी राह में

कब मिटेगा मुझ पर से अत्याचार


हर तरफ जंगल बिछाये कारखानों के

चारों तरफ विषैली धुआँ हवा में है छाई

जीव हुए है बेघर यहां पेड़ो के कटने से

सब मनुष्य ने संपदा की बर्बादी मचाई


सूखे की मार से सब के कंठ हुए व्याकुल

प्यासे लोगों ने खींचा गहराई का भी पानी

सूखे में नदिया नाले के रूप में बदल गई

जो बहती थी कल कल धरती पर पावनी

हरी-भरी धरा अपनी कीटनाशी से यहां

क्षमता खोकर बंजर हो रही है यहां धरती


प्लास्टिक कचरे का आकार यहां बढ़ रहा

खाकर उस कचरे को नित गायें यहां मरती

सबने उगाई है यहां पर दूषित संस्कारों से

भृष्टता फैली हर तरफ आतंक की फसलें

सब तरफ मचा है यहां पर मौत का तांडव

अब कौन करे हल यहां के ये सारे मसले ?



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy