मेरे चांद
मेरे चांद
सूरज की तपिश से
तपती धरती
बाट जोहती है
रात के पहर का
जब चांद की शीतल किरणें
कर देंगी शांत
उसके दग्ध तल को
ठीक वैसे ही
बिरह की अग्नि में
तपता मेरा मन
है प्रतीक्षारत
कि तुम आओ
और तुम्हारे प्रेम की
शीतल वर्षा
दे सके राहत
विरहाग्नि में जलते
मेरे मन को
आ भी जाओ
मेरे चांद....

