मेरा प्यार सिर्फ तुम
मेरा प्यार सिर्फ तुम
सारी कायनात,
तुम में सिमट जाती है।
मैं आसमां देखता हूँ।
मुझे तू नजर आती है।
सारी कायनात,
"तुम" नजर आती है।
वैशाख के खेतों की,
रंगत में,
तेरा चेहरा पाता हूँ।
तेरी उठी-गिरी पलकों में ,
मौसम को बदलता हुआ
पाता हूँ।
तू जो भी रंग ओढ़े,
वही रंग ,
धरती से आसमां तक
बिखर जाता है।
हवा की छुअन में ,
जैसे कोई " रब" पा जाता है।
बाहें खोल,
मैं इसे भरता हूँ।
मैं तेरे होने की,
आहट पा जाता हूँ।
और मेरा रोम -रोम
खिलता है।
और जब जिदंगी की
उदासी में,
यह जीवन जब खलता है।
नदिया की कल -कल में ,
तेरी सांसों को सुनता हूँ।
जिस चीज को भी
" मैं "छू लूँ, तुम को
छूने सा लगता है।

