STORYMIRROR

Shailaja Bhattad

Tragedy

4  

Shailaja Bhattad

Tragedy

मेरा गांव

मेरा गांव

1 min
23K

खोज रहा हूं कब से

मिलता नहीं मुझे मेरा गांव

जुड़ जो गया है हर ओर से 

शहर से मेरा गांव


पगडंडियों पर दिखते नहीं खेल 

पटरियाँ ही पटरियाँ 

जिस पर दौड़ती दिखती है रेल

वह छुप्पन-छुपाई अब नहीं दिखती

राहगीरों की टोली भी अब नहीं सजती


बरगद के पेड़ की 

अब नहीं यहां कोई हस्ती

 ढूंढते रहे गांव, 

उस बरगद के पेड़ की छांव

पर दिखा 


एक शहर के बाद दूसरा शहर ही

घर के आंगन में सिमटते खेत ही

ए राहगीरों बता भी दो मुझे

क्या कभी मेरा गांव कहीं देखा है


उस राह का मुझे पता दो

थोड़ा सुकून मिले ऐसा भी

मुझे कुछ बता दो

मुझे मेरे गांव तक पहुंचा दो

मेरी जड़ों से मुझे मिला दो 


मैंने भी झोपड़ी बनाई थी कभी वहां

खेतों में फसलें लहलहाती थी जहां

खेत का पता मुझे बता दो 

मुझे मेरे गांव का रास्ता दिखा दो


गाड़ियों का शोर यहाँ बहुत है 

जिस ओर शोर कम हो , 

बस मेरा गांव उसी ओर है 

जहां आकाश में कलरव गूंजे 


जिस ओर से मिट्टी की सोंधी खुशबू लौटे

मेरी पगडंडी उसी ओर है

मेरा गांव उसी ओर है।  


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy