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Wakil Kumar Yadav

Drama


3.2  

Wakil Kumar Yadav

Drama


मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द

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मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ,

आसमाँ से ज्यादा जमीं की कद्र जानता हूँ।


लचीला पेड़ था जो झेल गया आँधिया,

मैं मगरूर दरख्तों का हश्र जानता हूँ।


छोटे से बडा बनना आसाँ नहीं होता,

जिन्दगी में कितना जरुरी है सब्र जानता हूँ।


मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली,

छालों में छिपी लकीरों का असर जानता हूँ।


बेवक़्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूँ,

आधे दुश्मनों को तो यूँ ही हरा देता हूँ!!


काफी कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना,

क्योंकि एक दिन राख में मिलना है ये जानता हूँ।          


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