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PARNEESH MISHRA

Romance

5.0  

PARNEESH MISHRA

Romance

मैं, वो, और रात...

मैं, वो, और रात...

1 min
252


है चाँद की जो दास्ताँ

वो रात की किताब में

जुदा वो और बातें रात की

होठ थरथरा रहे यादों के सैलाब में

अब फुरकत की इन्तहा न करो

कमी लाओ अपने रुबाब में

बस करो ये ही दुआ

हो मैं, वो, और रात साथ में..


है गुल को क्या ऐतराज़

वो तो कब्र में भी महकता है

जुदा है दोनों तो क्या

तन्हाई बीते पलों पर फ़िदा है

हैरत हुई ख़ुदा को मेरी मुस्कान से

तभी कमी नहीं लाता अपने रुबाब में

मेरे पास तो एक ही दुआ है

हो मैं, वो और रात साथ में..




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