मैं खुद को पूरा कहता हूँ.....
मैं खुद को पूरा कहता हूँ.....
कमबख्त दिल को रोज़ नया, खुमार छा जाता है
ख्वाहिशों की ज़मी, खुशियो का आशियाँ बनाता है
कर तकिये से दीदार, मल्लिका-ए-नूर मेरी
तुम थी महज ख्वाब, हो अब हकीकत मेरी।
ना रूठना जान-ए-बहार, मनाने का इल्म ना मुझे
एक करवट तो लो, बांहें बढ़ा थाम लूँगा मैं तुझे
हम होते हैं ना साथ, तो आसमा मे चांद भी शर्माता है
मुस्करा के जो देती हो साथ मेरा,
हमारी मोहब्बत की कसम, दिल मगरूर हो जाता है।
तो बस यही मुस्कराहट, ताउम्र बनाये रखना,
आँखे खोल, नींद तोड़, कैद कर लू पहली झलक तुम्हारी,
कभी दूर पर दिल के पास अपनी दस्तक बनाये रखना।
तुम्हारा हस कर पास आना, बरकत लाए मेरे ख्यालो में,
तेरा कहना की मुझे ना कदर तेरी, रुला जाए हर पल तेरी यादो में,
तेरे होने का शबाब, मेरी चलती जिंदगी की धड़कन,
कैसे ? आखिर कैसे बतलाऊ कितना चाहे तुझे ये मन।
जो तुम समेटती हो मुझे, जब मैं बिखरने लगता हूँ।
बांध देती हो मुझे, जो मैं टूटने लगता हूँ।
कहो कैसे ना करू, उस दिल से प्यार,
जिसमे मैं खुद रहता हूँ।
कसम खुदा की तुझे पाकर मैं खुद को पूरा कहता हूँ।

