Revolutionize India's governance. Click now to secure 'Factory Resets of Governance Rules'—A business plan for a healthy and robust democracy, with a potential to reduce taxes.
Revolutionize India's governance. Click now to secure 'Factory Resets of Governance Rules'—A business plan for a healthy and robust democracy, with a potential to reduce taxes.

Shakuntla Agarwal

Abstract Others

4.5  

Shakuntla Agarwal

Abstract Others

"मानुष"

"मानुष"

1 min
320


यौवन तेरा ढलता जाये

क्यों, तू प्राणी समझ ना पाये?

बसन्त जाये तो पतझड़ आये

पतझड़ में भी जो सम रह पाये

असल में मानुष वही कहलाये

सांसारिक बन्धन तुझे लुभायें

रह-रहकर तेरा मन भरमायें

कीचड़ में जैसे कमल खिले

कीचड़ उसको छू ना पाये

सांसारिक भोगो के कीचड़ में

कमल की भांति जो रह पाये

असल में मानुष वही कहलाये

वानप्रस्थ की उम्र जब आये

भोगी से जोगी बन जाये

ईश्वर भक्ति में लौ लगाये

बुलावा आये जब काल का

अपनी करनी पे ना पछताये

अपना मार्ग प्रशस्त कर जाये

असल में मानुष वही कहलाये

पंचतत्वों का बना शरीर

पंचतत्वों में ही मिल जाये

अन्त समय में अग्नि "शकुन"

तुझे जलाये, मुट्ठी भर राख 

गंगा बहा ले जाये

मूढ़ से ज्ञानी बन जाये

काया को परमार्थ में लगाये

असल में मानुष वही कहलाये।। 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract