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OJASWINI YADAV

Classics Others Children

5.0  

OJASWINI YADAV

Classics Others Children

माँ...

माँ...

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अब मैं क्या ही बताऊ उसके बारे में।

शब्द ही नहीं मिलते उसे शब्दों में सुनाने को। 

मैं धुप से मुरझाया पौधा, वो मेरी छाँव है। 

मैं डूबता हुआ तिनका, वो मेरी नाव है। 

वो मुझे सहलाती हवा है। 

मेरे हर ज़ख्म की दवा है। 


ना जाने कैसे सारे सवालों  को हल कर देती है। 

ना जाने बिन बताये भी कैसे सारे ख्यालों को जान लेती है। 

मैं जब भी कमज़ोर पड़ी वो मुझे बल देती है।

ना जाने कैसे मेरे मन की किताबों को पढ़ लेती है। 

ना जाने कोन सा जादू करती है जो सच और झूठ को मेरी बातों से पहचान लेती है। 

बोलने के पहले ही खवाबों को हक़ीक़त बना देती है। 


दुनिया से नौ महीने ज्यादा जानती ह वो मुझे,

वो मेरी ढाल है, मेरी जान है, मेरा अभीमान है।

 वो मेरी पहली गुरु है, मेरा  गुरुर है वो। 

है वो सब कुछ मेरा, मेरा सब कुछ उसी से है। 


जानते हो वो कौन है ?

मेरी माँ,मेरी जननी, मेरी दोस्त जैसी मम्मी। 

मुझे प से पानी पढ़ने वाली, बन गयी मेरी कहानी की रानी।

वो बन गयी प से प्रेणा मेरी!


माँ...एक छोटा सा शब्द मगर उसका डिल इतना बड़ा है की उसमे पूरी दुनिया समा जाये।  

माँ...जिसके पास दुनिया-जहाँ की हर ख़ुशी मिल जाये। 

माँ...जिसकी गोद में सिर रख लिया तो दुःख नहीं फिर। 

 

गुस्सा भले ही कर ले वो मुझपे बहुत ,

फिर प्यार से मानाने भी आती है वो खुद। 

 कभी कहती है मैं उसकी गोद में सोने के लिए बड़ी हो गयी हु,

कभी कहेगी अकेली मत सोओ अभी छोटी हो, 

ख़ैर मैं तो फिर भी उसकी गोद में सो जाती हूँ। 

मैं तो कितनी भी बड़ी हो जाऊँ , मैं तो उसकी के हाथ से खाती हूँ। 


मेरी मुस्कानों पैर अपना सब कुछ वार देती है मेरी माँ। 

मुझे अनंत , असीम प्यार देती है मेरी माँ। 

बीमार होने पर मेरी नज़र उतर देती है मेरी माँ। 

मुझे बिना किसी शर्त के बेहिसाब दुआएं देती है मेरी माँ। 


 मेरे किसी से इतना लड़ने के बावजूद कोई मुझे इतना प्यार कैसे कर सकता है,

कोई मेरी इतनी बदमाशी के बाद भी मेरे हर सपने में मेरे साथ कैसे खड़ा रह सकता है। 

वो दफ्तर भी जाती है, खाना भी बनती है, और मुझ पर खूब प्यार भी लुटाती है,

कोई एक  व्यक्ति इतना कुछ कैसे कर सकता है ?


माँ तेरी चूड़िओं की खनक,तेरी पायल की झनक,

जैसे बजे कोई वीणा। 

तेरी बिंदिया,ये लाली,तेरी कानो की ये बाली ,

जैसे सावन की वर्षा बिखेरे हरियाली। 

तेरी आँखों की ये चमक , तेरे नयना कजरारे,कारे-कारे 

जैसे निशा में चमके चाँद चांदनी फैला के। 

 

लोग माँ को भगवान् का रूप कहते हैं, 

भगवान के महिमा अपर है। 

मैंने कहती हूँ भगवान से बढ़के है माँ...

तभी तो माँ का प्यार पाने को भगवान  भी रचते खेल हज़ार हैं!


वो अपने अंचल से मुँह पोछ दे, मुँह चमक जाता है,

 वो सर पे हाथ फेर दे सर दर्द मिट जाता है,

मखमल के बिस्तर में वो बात कहाँ.... 

जो उसकी गोद में है ! 

रसोइओं में वो बात कहाँ....

 उसके हाथों के स्वाद में है !

उसके एहसास जैसा सुकून इस दुनिया में कहाँ....


Mumma आप से ही मेरी हसीं ,आप से ही हर ख़ुशी ,

हर जनम में तू ही माँ चाहिए , इतनी सी मन्नत है।

क्युकी तू खुदा के घर से भी ज्यादा सुन्दर जन्नत है !!



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