ऐसी तो नहीं थी में
ऐसी तो नहीं थी में
ऐसी तो नहीं थी में,
में दूसरों को खुश रखना चाहती थी...
में सबको हँसाना चाहती थी...
में इस दुनिया के काबिल बनना चाहती थी।
मगर लोगों के काबिल बन सके इस काबिल कोन है ?
लोगों को खुश देखने से बेहतर अंधे हो जाना है...
इस दुनिया का होने से बेहतर खुदमे में ही खो जाना है,
किसी के काभिल होने से बेहतर खुद का ही हो जाना है।
ऐसी नहीं थी में हमेशा से,
क्यों करू, पर अब ऐसी ही हूँ सदा के लिए !
ये वादा है मेरा खुदसे, खुदसे और खुदा से,
अब ऐसी ही हु में सदा के लिए।
अब फर्क़ नहीं पड़ता....
लोग कहते हैं में स्वीकार लेती हूँ,
लोग बोलते हैं में मान लेती हूँ,
लोग सुनते हैं में सुन लेती हूँ,
लोग कहते हैं तुम हार गयी...,
तो मैं चुप-चाप हर मान लेती हूँ।
जो कोई नहीं सुनता में उस चुप्पी को कागज़ पे उतर लेती हूँ,
और फिर में अपनी कविताएं, अपनी कहानियाँ अपने-आप को ही सुना लेती हूँ !
लोगों ने मुझे जल की शीतल धारा कहा, क्या में पानी हूँ ?
लोगों ने मुझे पागल बाला कहा, में अपनी ही दुनिया की रानी हूँ !
लोगों ने मुझे कमज़ोर गुड़िया कहा, बता दूँ में एक अमर कहानी हूँ !
लोगों ने मुझे कटुक भाषी कहा, में तो बस सच्चाई हूँ।
लोगों ने मुझे तीखी ज़ुबान कहा, मैं क्या कोई छुरी की धारी हुँ ?
किसी पेड़ ने कहा मुझे धुप घनी, किसी के लिए में पानी हूँ... तो किसी केर लिए में उसे काटती आरी हुँ ?
ऐसी नहीं थी में हमेशा से,
क्यों करू, पर अब ऐसी ही हूँ सदा के लिए !
ये वादा है मेरा खुदसे, खुदसे और खुदा से,
अब ऐसी ही हु में सदा के लिए।
