क्षितिज पर मिलनाहोगा
क्षितिज पर मिलनाहोगा
नदियाँ बहती हैं,
मैं किनारों से तुम्हारा पता पूछती हूँ।
सूरज स्वर्ण सा चमकता है,
मैं किरणों से तुम्हारा हाल पूछती हूँ।
मैं बादल में तुमको खोजती हूँ,
मैं हर रोज तुम्हें सोचती हूँ।
खूब बरसते बादल सावन में,
तब हरियाली आती है,
फिर दुनिया हरी-भरी हो जाती है।
खूब बरसती अखियाँ मेरी,
देखन को एक झलक तेरी,
अखियों की वर्षा आती है,
पर तब मेरे मन में पतझड़ लाती है।
खूब तरस ते कान मेरे,
अपना नाम सुनने को वाणी में तेरी।
हाय कैसी है दशा ये मेरी?
क्यों दसों दिशाएँ चुपचाप ठहरीं,
क्यों हवाएँ मौन बैठीं?
एक सुनो तुम अमर कहानी,
अंबर और धरती की प्रेम कहानी,
दोनों ने हार ना मानी ,
ये है उनके मिलन की कहानी !
है प्रिय अंबर को धरती,
धरती को अंबर प्यारा है,
रिश्ता उनका अटूट, अति न्यारा है ।
धरती अंबर को चाहती है ,
अंबर को धरती भाती है ।
अंबर असीम, आज़ाद, वैरागी है,
धरती उसकी अनुरागी है ।
धरती धर्म से बंधी हुई है,
धरती पर जिम्मेदारी है ,
फिर भी अंबर को धरती प्यारी है ।
धरती मिलना चाहती है आकाश से,
देखना चाहती है अंबर को पास से ।
अंबर भी धरती से करता स्नेह बहुत,
पर वो भी वैरागी है ।
दिन निकलता है ,
सूरज अंबर का संदेश धरती को दे जाता है,
और अंबर तक धरा का खत ले जाता है ।
धरती अंबर की अधूरी अभिलाषा है
दोनों को एक दूसरे से मिलन की आशा है,
उनका मिलना एक भ्रम है !
इस बात से सबकी आँखें नम हैं ।
मिलना उनका एक तृषा है,
माना कि ये भ्रम है मृग तृष्णा सा
माना कि ये क्षितिज पर मिलन है भ्रम मृग तृष्णा सा
पर प्रेम भी तो है ना
परितृष्णा सा ?
अंतिम में क्षितिज पर वे मिल जाते हैं,
तब पतझड़ में भी फूल खिल जाते हैं !
वैसे ही...
तुम मेरी कविताओं का राग हो, मेरा अनुराग ।
हो तुम मेरी प्रेरणा, तुम ही मेरी धारणा ।
यकीन है मेरे मिलना हमारा होगा कभी,
कहीं नहिं तो क्षितिज पर होगा ।
पर प्रेम का अंत नहिं होगा,
यह यकीन हैं मेरा की मिलना हमारा एक दिन अवश्य होगा !

