prem(प्रेम)
prem(प्रेम)
जब चढ़ता है रंग प्रेम का
के जब चढ़ता है रंग प्रेम का
तो रंग ये सरे फीके लेगते हैं
ज़माने की फ़िक्र नहीं रहती
फिर तो जीवः केवल अपने प्रीतम का नाम है कहती
जैसे कोई नदी है बहती ,एक आस लेकर
के जैसे कोई नदी है बहती
जैसे उसे समंदर से मिलने की आस है रहती
जानती ह वो समंदर के पानी को मीठा नहीं कर सकती फिर भी वो शिखर से जन्मी शीतल सरिता सागर से मिल जाती है
वो सागर को पाने हेतु अपनी मिठास भी भूल जाती है
कुछ कुछ ऐसी ही ह हिमवंत की पुत्री पार्वती के पवित्र प्रेम की कहानी
उसने भी थी महादेव से मिलने की ठानी
जन्मों तक तरसी मगर हार न मानी
108 जनम लिए शिव से मिलने के लिए
और बनी उमा, रमा, और भवानी
एक बार सती बन महादेव के सम्मान हेतु अग्नि म जल कर रोक दी थी अपनी सांसो की रवानी, त्याग दी थी दक्ष प्रजापति की राजधानी
और अंत में पार्वती बन तप किया, अपना सब कुछ त्याग दिया
और महादेव को माना लिया
प्रीत यही तो होती ह जो खुद को भूल क्र किसी से होती है
ख़ैर सबको उनकी प्रीत नहीं मिलती
कुछ नदियाँ समंदर के मिलने के पहले ही सूख जाती हैं
पौधे म उगी हर काली खिल नहीं पाती हैं
कुछ बस मिटटी में मिल जाती हैं
एक और कहानी सुनोगे कृष्ण और राधा की
वो मिल ना सके रास्ते में उनके बहुत सी बाधा थी
राधा जो नाज़ुक कोमल सी काली थी
वो बरसाने की गलियों म पाली थी
और कृष्ण, गोकुल का माखन चोर
जो गोपियों को सताता था, सबको मुरली की मधुर धुन पैर नाचता था
राधा को उसका मोर मुकुट बहुत भाता था
राधिका गोरी को उस चलिए सँवारे का ऐसा रंग लगा, उसे कृष्ण का ऐसा संग लगा
वो दिन-रात कृष्ण को पुकारे और कृष्ण उसे सताता था
प्रेम ऐसा ही होता है निस्वार्थ, निष्छल, और निर्मल
प्रेम का कोई रंग नहीं होता
प्रेम करने का कोई ढंग नहीं होता
प्रेम खुद रंगहीन होकर भी बेरंग संसार को रंगीन बना देता है
प्रेम वो शीतल जल है जो सारी थकन मिटा देता है
प्रेम वो अमृत ह जो मीरा को दिए विष को भी निश्फल बना देता है
प्रेम जीवन को सफल बना देता है
प्रेम कुछ नहीं मांगता कुछ नहीं लेता
वो केवल बेरंग जीवन को रंगों से भर देता है
वो विश के प्याले को अमृत का सरोवर बना देता है
प्रेम पूर्ण समर्पण है, और आज की ये कविता उस पवित्र भाव को समर्पित...प्रेम
