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अर्चना कोहली "अर्चि"

Tragedy

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अर्चना कोहली "अर्चि"

Tragedy

लिख रही मैं अंजन से पाती

लिख रही मैं अंजन से पाती

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राधा-सा स्मरण में झुलस रहा तन-मन

बैरागिन होकर विचर रहती मैं बन-बन।

द्रवित हृदय से निकलती सदा बरसाती

तभी तो अंजन-मसि से लिखूं मैं पाती।।


तन्हाई से भीगी-भीगी हुई मेरी यामिनी

मृत प्राय: सी आज हो गई तेरी शालिनी।

ओ, पिया अब आकर दो प्रीत-संजीवनी

नहीं तो बन जाऊँ विरह में तेरे तपस्विनी।।


सुहाने दिनों की प्यारी सी पास है धाती

करुणा विगलित मन को वही है भाती।

रिश्ता हमारा अटूट दिया-बाती समान

अहर्निश तुझ पर लगा रहता है ध्यान।।


बिखरे-बिखरे ही रहते सदा ही कुंतल

उतार दिए हैं पिया सुंदर स्वर्ण-कुंडल।

अश्रुओं से फैल रहा मुख पर काजल

रुलाई फूटे देखकर ये काले-से बादल।।


बीते कई ही बरस, कब होगा समागम

टूटता जा रहा है अब दिनोदिन संयम।

द्वार पर बैठी कबसे कर रही इंतजार

अब तो सुन ले तू मेरी करुण पुकार।।



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