Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Tragedy


4  

Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Tragedy


बेरोजगार

बेरोजगार

1 min 231 1 min 231

मैं एक बेरोजगार हूं

मैं दुनिया में लाचार हूं

पढ़ने पर नौकरी न लगा,

मैं पढ़ाई की एक हार हूं

बरसों पढ़ता रहा हूं,

फिर भी मैं बेकार हूं

मैं एक बेरोजगार हूं


लोगो की नज़र में,

मैं एक खराब अनार हूं

कमाता कुछ भी नही,

मित्रों से मांगता उधार हूं

अपनी मजबूरी किसे बताऊं,

मैं उजाले मैं भी दागदार हूँ

मैं एक बेरोजगार हूं


लगता शीशे का तार हूं

सरकार से लाचार हूं

डिग्री रख रखी पास,

फिर भी भूखा संसार हूं

मैं एक बेरोजगार हूं


ख़ास शिक्षा हुनर की हो,

फिर कोई बेरोजगार न हो,

शिक्षा व्यावसायिक बने,

कहूँगा ये बात बार-बार हूं

अब समझा ये बात हूं

रखना खुद को आग में,

फिर बनूँगा सोना मैं,


मैं बना अब समझदार हूं

अब लाखों के बीच में,

ख़ुद को बनाऊंगा तलवार हूं

सफलता मुझे मिलेगी,

मैं बताऊंगा चमत्कार हूं

मैं बेरोजगार नहीं बनूँगा,

मैं मेहनत का पारावार हूं



Rate this content
Log in

More hindi poem from Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Similar hindi poem from Tragedy