कुदरती करिश्मा है नारी
कुदरती करिश्मा है नारी
कुदरती करिश्मा है नारी ।
धरती की गरिमा है नारी ।
अपमान करे जो नारी का,
वह क्या जाने, क्या है नारी?
नारी बिन सूनी धरती है।
नारी जग के हित करती है।
इतनी जब नारी महिमा है,
नारी क्यों आहेंं भरती है?
पहले सीता ,फिर राम कहें।
पहले राधे, फिर श्याम कहें ।
फिर भी नारी के आगे क्यों,
हम झुकने को अपमान कहेंं ।
नारी बिन नर का मान नहीं ।
नारी बिन नर का ज्ञान नहीं ।।
फिर भी नारी की हस्ती को,
हम देते क्यों पहचान नहीं?
है शान इसी में ही तेरी ।
बस जान ,यही तो है तेरी ।
इससे ही तेरा रुतबा है,
पहचान यही तो है तेरी।
