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मोहित शर्मा ज़हन

Drama Tragedy Inspirational

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मोहित शर्मा ज़हन

Drama Tragedy Inspirational

कुछ शामें गुज़रती नहीं

कुछ शामें गुज़रती नहीं

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कुछ लंबी शामें सिरहाने पड़ी...

बीतने का नाम न ले रहीं।

कुछ दबी शिकायतें अनकही,

कुछ रूठी सदाएँ अनसुनी।

एक दुनिया को कहते थे सगी,

हमारे मखौल से उसकी महफ़िलें सजने लगी। 

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ज़ख्म रिसते हैं,

मर्ज़ की बात नहीं....

सब तो मालूम है,

पर कुछ हाथ नहीं!

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जवाब तैयार रखे थे,

सवालों की बिसात नहीं।

इतने सपनों को ठगने वाली...

इस रात की सुबह नहीं।

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खैर. .फिर कभी ये दौर याद करेंगे,

गुमसुम हालातों से बात करेंगे...

कभी चलना सिखाया था दुनिया को. ..

फिर कभी इसकी रफ़्तार में साथ चलेंगे।


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