STORYMIRROR

Taj Mohammad

Tragedy

4  

Taj Mohammad

Tragedy

कोई ना हो जान पहचान में।

कोई ना हो जान पहचान में।

1 min
388

आ चले वहां जहां कोई ना हो जान पहचान में।

थोड़ा सा वक्त बिताते हैं साथ किसी श्मशान में।।1।।


मैं दुआएँ बेचता हूँ इस जहान में।

खुदा ने बड़ी शिफा दी है मेरी ज़बान में।।2।।


देखा है जिन्दगियों को तड़पते हुए इसमें।

हमको ना पड़ना है इस इश्क के जंजाल में।।3।।


शक ना करना तुम हम पर खुदा के वास्ते।

हमसे यह गलती हुई है सच में अनजान में।।4।।


काफ़िर हो गया है वह जो कलमा नहीं पढ़ता है।

शायद उसका अकीदा हो गया है अब शैतान में।।5।।


कभी दिल से से सुनना मस्जिद से आती हुई सदा।

बड़ा सुकून मिलेगा तुझे बिलाल की आजान में।।6।।


तुमने ही हमको दी है ये नई ज़िन्दगी दोबारा।

हम हो गए है सर से पांव तक तेरे अहसान में।।7।।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy