Bhoop Singh Bharti
Tragedy
कलकल करती मैं बहूँ, पहाड़ अर मैदान
लहराती सी मैं चलूँ, अदभुत मेरी शान।
अदभुत मेरी शान, धरा को दूँ हरियाली
मैं जन गण की प्यास, बुझा ल्याऊं खुशहाली।
नदी की आत्मकथा, सिसकती नदिया मरती
कूड़े कचरे संग, बहे ना कलकल करती।
झूमता बसंत है
कुंडलिया : "म...
कुंडलिया
कुंडलिया : "प...
हाइकु : नव वर...
रैड क्रॉस
गीत
बस प्यार ही प्यार होता, प्रयत्न भी बेशुमार होता बस प्यार ही प्यार होता, प्रयत्न भी बेशुमार होता
तो दूसरी तरफ महत्वाकांक्षा की व्यर्थ उड़ान तो दूसरी तरफ महत्वाकांक्षा की व्यर्थ उड़ान
जानवरों के वास स्थल उजड़ते जंगलों से बिगड़ रहा पर्यावरण संतुलन जानवरों के वास स्थल उजड़ते जंगलों से बिगड़ रहा पर्यावरण संतुलन
ना जाने कितनी हसीनों के दिल इस भुल्लन की वजह से घायल थे। ना जाने कितनी हसीनों के दिल इस भुल्लन की वजह से घायल थे।
कहीं कोई भी पानी का स्रोत नहीं दिखाई पड़ा । तभी घर के पास मिट्टी का मिल गया एक घड़ा। कहीं कोई भी पानी का स्रोत नहीं दिखाई पड़ा । तभी घर के पास मिट्टी का मिल गया ए...
वो तिरंगे के रंगो को अलग अलग दिखाते हैं. वो तिरंगे के रंगो को अलग अलग दिखाते हैं.
ज़िंदगी से ही अपना सब कुछ हार रहा हूँ मैं खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा हूँ मैं। ज़िंदगी से ही अपना सब कुछ हार रहा हूँ मैं खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा ...
वन्य प्राणियों से भी छीन लिया उनका घर वन्य प्राणियों से भी छीन लिया उनका घर
ये लब भी थक चुका है तुम्हें समझाते समझाते, अब और इसे समझाने नहीं दूंगा ये लब भी थक चुका है तुम्हें समझाते समझाते, अब और इसे समझाने नहीं दूंगा
सूने रहने लगे हैं बगीचे बच्चों बिन, गुम होने लगे हैं गेंद खेलने वाले दिन। सूने रहने लगे हैं बगीचे बच्चों बिन, गुम होने लगे हैं गेंद खेलने वाले दिन।
कमर में एक कपड़े से बांधे हुए पेट में बच्चा लिए सर पर रेत ईंटें ढोती महिला कौन है? कमर में एक कपड़े से बांधे हुए पेट में बच्चा लिए सर पर रेत ईंटें ढोती महिला कौन है...
हमारी उर्दू में खयाल-ओ-ख्वाब का अकसर ज़िक्र रहा हमारी उर्दू में खयाल-ओ-ख्वाब का अकसर ज़िक्र रहा
किसी के बच्चे नहीं आये दुखी किसी के बच्चे नहीं आये दुखी
सडक के कोने में, बड़ा-सा कचरे का डिब्बा रखा था। सडक के कोने में, बड़ा-सा कचरे का डिब्बा रखा था।
भूल भविष्य के बारे में हम ज़्यादा कृतघ्न हुए, भूल भविष्य के बारे में हम ज़्यादा कृतघ्न हुए,
दोबारा कभी प्रकृति का सौंदर्य देख पाएंगे? दोबारा कभी प्रकृति का सौंदर्य देख पाएंगे?
फिर भी जिंदगी भर अपने कर्तव्य पालन करते रहते हैं फिर भी जिंदगी भर अपने कर्तव्य पालन करते रहते हैं
मुझे उसने छोड़ने में देर की मैं उसी का हो कर के रह गया। मुझे उसने छोड़ने में देर की मैं उसी का हो कर के रह गया।
धीरे धीरे गांव की जगह ली है जब से शहरों ने जंगल कटते जा रहे हैं धीरे धीरे गांव की जगह ली है जब से शहरों ने जंगल कटते जा रहे हैं
बहुत सी चिड़िया दाना चुगती एक चिड़िया रुठ कर बैठती। बहुत सी चिड़िया दाना चुगती एक चिड़िया रुठ कर बैठती।