कलकल बहती चंचला हूँ
कलकल बहती चंचला हूँ
मुझसे ज़रा अदब से पेश आया कीजिये ,
मेरा भी एक वज़ूद है,आप सब मान जाइए !
अपने धुन में आगे बढ़ती कलकल,चंचला हूँ,
अब अपना परिचय भी दे दूँ,मैं एक महिला हूँ !
सुनो मेरे प्यारे दोस्तों, सुनो मेरी सखियों,
मैं ना ऐसी वैसी हूँ ना कोई इतनी महान हूं !
हां मैं एक सशक्त गौरवशाली अभिमान हूं,
सब से मांगती अपने अस्तित्व का सम्मान हूं !
महिला दिवस मनाने की बड़ी खास बात है
सबके मन में जागी अब तो एक नई आस है !
डियर सखियों समझा करो हमारे ज़ज़्बात
इस दिन स्त्रियों की होती खुद से मुलाक़ात !
जीवन के सफ़र में कई बार होता है फसाद
हर बार सबके हित में करता कोई हिफाज़त !
सीधी डगर से जब छीन लेता कोई आसमान,
अक्सर मंजिल के पास आकर थकता इंसान !
अपने प्यारे बाबा की प्यारी सी गुड़िया हूं मैं,
बहनों की शान हूँ और भैया का अभिमान हूं !
पता है, मेरी भोली भाली मैया तो कहती है कि;
मैं उनकी लाडली हूँ और मैं तो उनकी जान हूं !
ज्यों ज्यों महिलाओं की उम्र बढ़ती जाती है ,
उनके पास तो जमा होती अनुभव की थाती है !
बढ़ती हुई उम्र कभी ऐसे थम ही नहीं सकती,
उम्रदराज़ हो या कमसिन सभी सम्मान पाती है !

