ख्वाहिशों का पूरापन
ख्वाहिशों का पूरापन
कुछ ख्वाहिशें
अधूरी हैं जो आज भी
अक्सर करती हैं सवाल मुझसे
अपने अधूरेपन का
मगर सूझता नहीं कोई जवाब
तमाम अटपटे सवालों का
सोचता हूँ कभी-कभी कि
क्या यही हस्र होता होगा
हर उस इंसान का
जिसके अन्दर पलता है
ख्वाहिशों का खूबसूरत इक बगीचा
ख़्याल ये भी आता है कभी-कभी कि
मुमकिन नहीं हर ख़्वाहिश अधूरी हो
मुमकिन ये भी है कि
कुछ ख्वाहिशें पूरी हों
बेशक आज नहीं तो कल
माना कि अंधेरे में सूरज नहीं उगता
मगर इंतज़ार तो हो सकता है
घने अंधेरे के छटने का
सूरज कल फिर निकलेगा
टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से होकर
नई भोर कल फिर महकेगी
आशाओं के शिखर पर
आड़ी तिरछी कुछ लकीरें
जो पसरी हैं सीना तानकर राह में
हर हाल में उनको मिटना होगा
अधूरी ख्वाहिशों के पूरेपन के लिए।
