STORYMIRROR

khushi kishore

Romance

4  

khushi kishore

Romance

खुद सा हो जाना!

खुद सा हो जाना!

1 min
310


शब्द कब पर्याप्त हुए हैं 

भावनाओं की अभिव्यक्ति में

क्या मुमकिन हो पाया है

हर किसी का शिव हो जाना 

मन है माना

आकाश सा

अंतहीन

विशाल मगर

कहो

कब है आसान

गिरहों का बस

खुल जाना 

लम्हे लम्हों में

फिसल रही

कतरा कतरा

जो जिन्दगी

क्या

तुम से हो पायेगा?

छोटा सा मोल

चुका पाना

शब्द जो ना

थिरके लबों पर

चुन लेना

खामोशियां मगर

सांसों की मद्धम 

लय पर

रख लेना

गीत कोई अनजाना

कुछ सुन लेना

 कुछ कह देना

 तुम आंखों की भाषा से

दिल में लिए बवंडर

 सुनो! 

डगमग ना हो जाना

हैं माना

 थोड़ी कठिन डगर 

संकरी सी पथरीली भी

चाहे हो जैसी

 राह है!

 कई कई मोड़ मुड़ जायेगी 

आए ना

 जब तक मनचाही डगर

 बस चलते ही रहना तुम

आसमान में भी तो देखो

 रंग कई बदलते हैं

घुमड़ते हैं बादल

 कभी इंद्रधनुष भी बनते है

दबी दबी और घुट्टी सी

 जाने कितनी आवाजों में

इक जरा सी

 कोशिश तुम करना

 बस खुद सा हो जाना।।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance