STORYMIRROR

Lipi Sahoo

Classics

4  

Lipi Sahoo

Classics

खण्डित

खण्डित

1 min
582

और कब तक अपनी लाश को

 कन्धों पर उठाकर भागते फिरोगा

 हर एक कदम मौत की तरफ़ है

 ये झूठला तो नहीं सकता


किसी ने क्या खूब कहा है

दिन पराया रात अपना

कब तक रात के इंतजार में

रुखसत हुए पलों को टटोलता रहोगा


ये हरियाली ये आसमान

तेरे लिए तो है बावरे

कभी जी भर के देखा है तुने ??

वक़्त ही तो नहीं है तेरे पास


मदारी के डमरू के साथ 

थीरकते हैं तेरे पैर

फिर भी मानता है तु

अपनी मर्ज़ी का मालिक


तु अभी भी खण्डीत है

पूर्णता से कोशो दूर

फ़ुरसत के दो पल निकाल

अपनी धड़कनों में डुब जा


तू अनंत का एक छोटा सा हिस्सा

उस से भी छोटा तेरा क़िस्सा

अब वक्त ज़ाया ना कर

यक़ीनन तेरे अंदर अजर अमर असीम बसा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics