उलफ़त
उलफ़त
1 min
309
क्या हर्ज है बोल देने में
उलफ़त भरे दो लफ्ज़
किसी ड़गमगाते को सहारा ही मिल जाए
दो कदम साथ चल दो
हमराह बन जाओ पल दो पल के
ग़म की तपिश शायद कम हो जाए
हल्के हल्के साथ हवा के
गुनगुना दो किसी बेनाम शायर की ग़ज़ल
क्या पता आसमान भी झूम उठे
इत्मीनान से दिखा दो उसे
रात के चादर ओढ़े चाँद को
दिल का अलम ही भूल जाए
थिरक ने दो पैरों को
किसी भूले बिसरे गाने कि धुन पे
उसे ताल मिलाने दो ताल से
रूबरू करा दो
जगमग करती रोशनी के कतार से
लहज़ा उदासी के निगल जाएगी
आलविदा बोलने से पहले
बलाएं ले लो छोटी सी मुस्कान की
शायद दो बारा मुलाकात हो ना हो....।।
