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Shakuntla Agarwal

Drama

4.7  

Shakuntla Agarwal

Drama

"ख़ामोशी"

"ख़ामोशी"

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मेरी ख़ामोशी अक्सर ये सवाल करती है,

ज़िन्दगी के बीते पलों का हिसाब करती है,

कदम बेताब थे मंज़िल पाने को,

बीच रास्ते में कहाँ भटके।


वो हिसाब करती है !

माना रास्तें सकरे थे,

पर मंज़िल पास थी,

हाथों से कैसे फिसल गयी मंज़िल,

ये सवाल करती है !

मेरी ख़ामोशी अक्सर ये सवाल करती है,

ज़िन्दगी के बीते पलों का हिसाब करती है !


नौका में बैठे थे,

चापू भी हाथ था,

किस दिशा में क़दम है बढ़ाना,

वो भी अहसास था,

फिर भी साहिल से रह गये कोसों दूर,

ये सवाल करती है !

मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !


तन्हा बैठे हैं, ज़िन्दगी के इस पड़ाव में,

शिद्दत से जिया था रिश्तों को,

फ़िर कहाँ हो गयी चूक ?

ये सवाल करती है !

मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !


रिश्तों को गूँथ कर माला पिरोई थी,

कैसे बिखरी रिश्तों की माला,

ये सवाल करती है !

मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !


सीने में ज्वालामुखी लिए जीते रहें ताउम्र,

कहाँ दबा के रखा लावा,

ये सवाल करती है,

स्वाभिमान की चिंगारी सुलगी भी मगर,

कहाँ हो गई फ़ना ?

ये सवाल करती है !

मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !


अश्क़ों का समुंद्र आँखों में छिपाये,

कैसे हँसते रहें हर - दम,

ये सवाल करती है,

दर्द के दरिया को,

पलकों ने कैसे संजोये रखा ?

ये सवाल करती है !

मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !


चुप्पी का आवरण ओढ़,

कैसे रहते हैं ख़ामोश ?

राख के ढ़ेर में कहाँ दबाये रखी चिंगारी ?

ये सवाल करती है,     

चिंगारी भी थी, बारूद भी पास था,

भभकने से, कैसे रोके रखा आग को ?

ये सवाल करती है,

"शकुन" मेरे बीते पलों का हिसाब करती है !     


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