कैंसर
कैंसर
उसे कैंसर है,
ये सुन कर
उसके हाथ कंपकपाएं थे,
आंखों के आगे
बस शून्यता सा लिए,
आंसुओं के साथ
जो रुक रुक कर बहने लगे,
स्तब्ध
शब्द सुन
रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
उसके होंठ
करीब करीब
हंसते हुए
बस मुस्कराए थे,
जैसे ये आखिरी हो।
जिस्म ठहर गया था,
अंदर ही अंदर
सुलगने लगा था,
कंठ सूखने लगे थे,
अनगिनत चिंगारियां
अंदर धधक रही थी
उसे जला रही थी।
एक गहरी टीस
जो अब उभर कर
उसके जिस्म की तहों को
गलाने लगी थी,
उसका पूरा जिस्म
नीला सा हो गया था,
उस पर उभरने वाली चमक
तेजी से उभर रही थी,
उसके अंदर की शुष्क रोशनी
फूटती हुई,
कहीं सुदूर
गहराई में,
धीरे धीरे समा रही थी,
और वो
अब शांतचित्त है,
स्थिर
निशब्द सी
चुपचाप अकेली।
