STORYMIRROR

Kavi kapil khandelwal 'Kalash'

Tragedy

4  

Kavi kapil khandelwal 'Kalash'

Tragedy

कैदी

कैदी

1 min
403

एक जिन्दगी

चारदीवारी में बंद

सालों से कभी

जिसने


गुनगुनी गुलाबी सर्द धूप

टिप टिप बारिश की बूँदे

उड़ते हुए पंछी

लहराती-इतराती -मचलती

सुनहरी धरा


होली के चटक रंग

दीपों से सजा घर-आँगन

नन्हे बच्चे की किलकारी

शादी की शहनाई

नहीं देखी-सुनी।


देखा है तो

सिर्फ और सिर्फ

लोहे की मोटी - मोटी

सलाखें

पत्थर की सख्त दीवारें

और वही एल्युमीनियम की

प्लेट और कटोरी।


बस उसे इन्तजार है

आजाद होने का

जिससे

वह दूर क्षितिज में

उड़ते हुए पंछी

की तरह खुले गगन में

फ़ड़ फड़ा और उड़ सके।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy