जून तुम फिर आना...!
जून तुम फिर आना...!
"जून " तुम फिर आना,
लेकर सौगात
खुशियों की अपने संग
मेरे अपनों को
फिर गांव लाना।
अपनों के बिना
गांव के पंधेर भी तरस गए हैं
कच्ची सड़कों में लगे पहरे हैं,
गांव की छोटी छोटी
दुकानों में खरीदार नहीं हैं,
मंदिरों की घंटियां खामोश
दरवाजों में कुंडियां लगी हैं,
पगडंडियां अब भी
पुराने पल याद करती है
जहां वो गुजरे थे कभी
उस धूल में खुद
सराबोर रहती है,
पूरा गांव बेबस लाचार है
गाड़ गधेरे सूने
आम कटहल के बगीचे बेज़ार है।
पिछले जून जब गांव में
भीड़ लगी थी
रौनक हर तरफ
अपनों की महफिल सजी थी,
बेटी बहनों के चौफले,
हंसी ठटटो से
गांव झूम रहा था
बच्चों की शैतानियां से
हर कोना गूंज रहा था ।
कुछ बिछड़े यार
पुरानी यादों में खो गए थे
बुजुर्ग भी हमउम्र संग
इधर उधर
चहल कदमी कर रहे थे,
बेडू, तिमला, हिसर
पहाड़ी फल
स्वागत में बिछे हुए थे
नौजवान गांव की
छटा देख सेल्फी
लेने में लगे हुए थे,
खेत खलियान
बाग बगीचों में
हर तरफ अपने ही लोग
नजर आ रहे थे
जून की छुट्टियों का
सभी आनंद मना रहे थे,
देख प्रवासियों को अपने
गांव फिर
जीवंत हो उठा था
अपनी मस्ती में झूम कर
हर्षित हो रहा था।
कहीं आलू की थिचोड़ी,
कफलू, बाड़ी,झुंगर
सब पेट भर खा रहे थे
बेटी ब्वारियों को
व्यंजन का तरीका
सिखा रहे थे,
कुल देवता के मंदिर में
रोज साफ सफाई चल रही थी
रोज सामने उनके
आरती, दीया बाती
जल रही थी,
सच अपनों के आने की
बात ही अलग थी
कुछ दिन ही सही
ये खुशियां
हर किसी को नसीब थी।
