जख्म अपना बताना नहीं चाहता।
जख्म अपना बताना नहीं चाहता।
जख्म अपना बताना नहीं चाहता
मैं किसी को रुलाना नहीं चाहता
दास्तां अपनी सब को सुनाकर यहां
दिल किसी का दुखाना नहीं चाहता
जान कहती थी वो बेवफा हो गई
जाने मुझसे क्या ऐसी खता हो गई
बात दुनिया को जब ये बताया तो फिर
सारी दुनिया भी मुझसे खफा हो गई
आ चुका हूँ मोहब्बत में जिस राह पर
मैं किसी को बुलाना नहीं चाहता।।
जख्म अपना बताना नहीं चाहता
मैं किसी को रुलाना नहीं चाहता ।।
अपने घर का अकेला दुलारा था मैं
बूढ़े बापू व माँ का सहारा था मैं
एक दिन एक हसीने से नजरें मिली
फिर उसी के लिए घर उजाड़ा था मैं
प्यार करता हूँ अब भी सभी से मगर
दिल किसी से लगाना नहीं चाहता।
जख्म अपना बताना नहीं चाहता
मैं किसी को रुलाना नहीं चाहता ।।
