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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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जिंदगी के तीर

जिंदगी के तीर

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जिंदगी के तरकश में तीर तो बहुत थे,पर चला न सके

हमारे दोस्त बहुत थे,पर समय पर कोई आ न सके

हम बस गफ़लत में जी रहे थे,आंसुओ को पी रहे थे,

पलकों में हमारे आंसू थे हज़ार,पर हम बहा न सके


इल्ज़ाम किसे देता ख़ुद को,ज़माने को समझ न सके

जिंदगी के तरकश में तीर तो बहुत थे,पर चला न सके

कोई पानी मे डूबता है,हम साखी जग-दरिया में डूबे

लहरे थी भावनाओं की और हम ख़ुद को बचा न सके


टूटकर हम संभल न सके,शीशे में ख़ुद को देख न सके

शीशे में अक्स बने थे हज़ार,ख़ुद-बिंब खुद देख न सके

कैसे नादान बने थे,चेहरे पे लगे चश्मे को हटा न सके

जिंदगी के तरकश में तीर थे हज़ार,पर चला न सके


जब ठोकर लगी वक्त की,अपनों के दग़ाबाज़ी की,

तब जाकर हम सम्भले,तब तक उम्र रेत संभाल न सके

ख़ूब रोये,ख़ूब पछताये,गुनाहों की माफी मांग न सके

वक्त रहते संभलना, हम ठोकरों से धूल भी हटा न सके।


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