जिंदगी के तीर
जिंदगी के तीर
जिंदगी के तरकश में तीर तो बहुत थे,पर चला न सके
हमारे दोस्त बहुत थे,पर समय पर कोई आ न सके
हम बस गफ़लत में जी रहे थे,आंसुओ को पी रहे थे,
पलकों में हमारे आंसू थे हज़ार,पर हम बहा न सके
इल्ज़ाम किसे देता ख़ुद को,ज़माने को समझ न सके
जिंदगी के तरकश में तीर तो बहुत थे,पर चला न सके
कोई पानी मे डूबता है,हम साखी जग-दरिया में डूबे
लहरे थी भावनाओं की और हम ख़ुद को बचा न सके
टूटकर हम संभल न सके,शीशे में ख़ुद को देख न सके
शीशे में अक्स बने थे हज़ार,ख़ुद-बिंब खुद देख न सके
कैसे नादान बने थे,चेहरे पे लगे चश्मे को हटा न सके
जिंदगी के तरकश में तीर थे हज़ार,पर चला न सके
जब ठोकर लगी वक्त की,अपनों के दग़ाबाज़ी की,
तब जाकर हम सम्भले,तब तक उम्र रेत संभाल न सके
ख़ूब रोये,ख़ूब पछताये,गुनाहों की माफी मांग न सके
वक्त रहते संभलना, हम ठोकरों से धूल भी हटा न सके।
