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DRx. Rani Sah

Abstract Children

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DRx. Rani Sah

Abstract Children

झूला, कौवा, झील, अख़बार

झूला, कौवा, झील, अख़बार

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पीपल की डालियों से दो डोरी बांधकर झूला झूलते थे, 

सच कहूँ तो उतने ही ऊँचाई पे मानो हर रोज आसमान चूमते थे, 


झूले के संवेग से दोस्तों के संयोग से, 

खुशियों का बगीचा था, 

झूले पे बैठते ही आँखों में चमक अलफाजों में खनक, 


हर चीज मोहब्बत सा खिल उठता था, 

वही पीपल के पेड़ के पास एक बड़ा झील बहुत गहरा था, 

झील किनारे एक काला कौवा चुप चाप शांत बैठा था, 


मेरी नजर में वो कौवा एक रोज कैद हुआ, 

मैंने खिलखिला के हंसा था, 

जब रंग में गिरकर कौवा काला से सफेद हुआ था, 


फिर झूम उठा था वो बादल भी, 

जी भर के मजा लिए थे बरसती बारिश की, 

एहसासों के चादर में खुद का मन लपेटे हुए, 


घर की तरफ छम छम करते चल दिए, 

फिसलती मिट्टी पे पैरो से चलते आते थे, 

उड़ती जिंदगी की ख्वाब पलकों मे सजाते थे, 

कभी जिद पे उतरते कभी रूठ जाते थे,

 

अपनी चाहत पूरी करवाने के लिए दादा जी से गुहार लगाते थे, 

आज भी वो पल याद आता है कैसे अपनी बात मनवाने के लिए अखबार छुपाते थे, 


लेकिन गुजर जाती थी हर दिन बड़े प्यार से, 

चुटकियों मे हर चाहत पुरी हो जाती थी, 

क्योंकि दादा जी दूर नहीं रह सकते थे अपने अखबार से, 


क्या क्या नादानी करते थे ढेरों शैतानी करते थे, 

कोई मुझे डांट दे वहाँ दादी खड़ी हो जाती थी, 

ना जाने कितनी बार मुझे सजा से बचाती थी, 


सभी घर में समझते थे हर चीज ला कर देते थे, 

पर दादा जी मेरे दोस्त सबसे अच्छे थे, 

हर दर्द से पहले दवा मिल जाता था, 

हर कोई मुझ पे प्यार लुटाता था, 


जिद्द कितनी भी बड़ी क्यों न हो, 

हर खिलौना हर सामान वो कागज का बना दादा जी का अखबार दिलाता था।



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