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Surendra kumar singh

Classics

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Surendra kumar singh

Classics

झंझावात है बाजार में

झंझावात है बाजार में

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दुनिया थी ही एक बाजार

एक माया का बाजार है दुनिया

और दुनिया फिर बन रही है एक बाजार

कहते है इसे आधुनिक बाजार

मुक्त व्यापार।

बाजार में है लोग

और लोगों के नजरिये

बाजार की नब्ज पर अंगुलियां पकड़े बुद्धिमान लोग

फरमाते है यह संक्रमण काल है

चिंतन काल है

लेकिन कितना मुश्किल है

अपने ही फ़टे पुराने कपड़ों को उतार फेंकना

कितना मुश्किल है अपने को अपने से अलग करके देखना

अपने ही विचारों में अपने को देखना

बाजार में अपने विचारों को देखना

कितना मुश्किल है

इस छोटी सी जगव्यापी कश्मकश

के बुखार से मुक्ति पाना सहज होना।


कितना अच्छा लगता है

अपने विचारों के झूले में झूलते रहना

झूलते ही रहना

अपने ही गीत गुनगुनाना

गुनगुनाते ही रहना

अपने ही विचार की संगति पर।

कितना अच्छा लगता है

नये नये परिधानों में सजना संवरना

और संवरने के जुनून में बिल्कुल नंगा हो जाना

विचारों के जुलूस का अहम हिस्सा बन जाना

निर्णायक बन जाना।


दुनिया थी ही एक बाजार

और दुनिया फिर बन रही है एक बाजार

व्यस्त लोगों की व्यस्त बाजार

और इस बाजार में आदमी और आदमी के बीच का पुल

कविता टूटकर सड़क बन गयी है

कपड़े चिथड़े चिथड़े

पेट और पीठ बिल्कुल एक

बाल दूध से सफेद

चेहरे पर अनगिन झुर्रियां

गुजर रहा है ऊपर से रहनुमाओं का जुलूस

विचारों का कारवां

तार्किक संवाद

नायलॉन के टायरों की गाड़ियां फौजी टुकड़ियां,

लेफ्ट राइट करती हुयी

टोकता हूँ प्रिये कविते

किनारे आओ

अपनी बदहाली का समाचार मुझे तो सुनाओ।

कविता बोली

शांत मनुष्य शांत

धीमे बोलो धीमे, बगल में संसद चल रही है

और ऊपर देखो और ऊपर

उधर वो दूर बहुत दूर हरा हर विकास का अंतरिक्ष यान

मेरे ही ऊपर लैंड होने वाला है

और उस तरफ देखो उस तरफ

आकाश में ही विकास की प्रच्छन्न चमक

विचारों की जंग।


मैंने फिर टोका

भीड़ से बचो प्रिये

कुचल जाने का डर है

रूप बदल जाने के खतरे है

कविता बोली

अरे पगले ये भीड़ क्या है

पृथ्वी ही टिकी है मेरे शरीर पर

देखो मेरी श्वास चल रही है न

इसे चलने दो

आकाश है न मुझे देखने वाला

मुझे खामोश पड़ी रहने दो

उठी तो मुझपर टिके जहां का क्या होगा

इसी डर से सोयी सोयी रहती हूं

अपने आप में खोयी खोयी रहती हूं

अक्सर तुम्हारी तरह कोई आता है

दिमाग से बैगनी किरणों की स्पार्कलिंग कराता है

मैं खामोश पड़ी रहती हूँ

देखती रहती हूॅं जुलूसों की रवानी

विचारों की जंग

सुनती रहती हूॅं बूटों की खटखटाहट

नारों का चुलबुलापन।

मैंने कहा खोयापन खोवो कविते

चौराहे से बाजार में चलो

उठाओ हाथ में तलवार बनाओ

मनुष्य के लिए रास्ता

बदलो अपना रूप।

कविता बोली

मुझे अपने आप से लड़ने दो

मुझे अपना दिमाग बदलने दो

अविश्वास की इमारत को थोड़ा और गिरने

दो संवाद के सम्प्रेषण का डर मेरे अंदर से निकलने दो

आदमी नाच रहा है न

इसे ठहरने दो

ठहरकर कुछ सोचने दो

ईश्वर की आंख थोड़ा और खुलने दो।


दुनिया थी ही एक बाजार

एक माया का बाजार है दुनिया

और दुनिया फिर बन रही एक बाजार

और इस बाजार में

अधर्म की गोद में खेल रहा है धर्म

अराजकता की गोंद में फुदक रही है राजनीति

और कुव्यवस्था की गिरफ्त में कसमसा रही है व्यवस्था

और त्रासदी तो ये है

प्रयोग करते करते

हम खुद ही बन गये है प्रयोग का हिस्सा

जहां विचरण कर रहे है हमारे विचार

और हम लगा रहे है ध्यान में ही एक छलांग।


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