जब भी हम कविता कहते हैं
जब भी हम कविता कहते हैं
उनकी जफ़ाओं को
उनकी वफ़ाओं को
पल-पल सहते हैं
अब जब भी हम
कविता कहते हैं
एक नदी सी निकलती है
दूर कहीं मन से
तनहाइयों खाइयों में
बुनती है सपन से
फिर खयालों के
पर्वतों से होकर
एहसास के समंदर में
रह जातीं हैं खोकर
हम तो बस एक
तिनके से रहते हैं
अब जब भी हम
कविता कहते हैं
बहुत गहरा है
सपनीला समंदर
फिर भी समा जाता है
कविता के अंदर
इक हूक सी उठती है
यादों की अगन से
इकपीर से उभरती है
सपनीले नयन से
कतरा-कतरा होकर हम
आंसुओं से बहते हैं
अब जब भी हम
कविता कहते हैं।
