दोहा-दरबार
दोहा-दरबार
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फागुन की आमद सखी,
मन में भरे उमंग।
रंग रंगीली चूनरी,
भीगे सातों रंग।।
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प्रेम भरे इसरार की,
पिचकारी ले थाम।
बरसाने की राधिका,
फिरती ढूँढे श्याम।।
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कौन भला रोके उसे,
कौन करे मनुहार।
श्याम रंग जिस पर चढ़े,
उतरे नहीं खुमार।।
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जोगन बन मीरा कहे,
भूली मैं घर- द्वार।
जोगी तेरे रंग में,
भीगे सब संसार।।
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हथियारों से अब नहीं,
दुनिया हो बेहाल।
पिचकारी में प्रेम के,
भर लो रंग गुलाल।।
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रंग उड़े बस प्रीत का,
सुख का उड़े अबीर।
प्रेम बिना सब झूठ है,
गाता फिरे फकीर।।
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