इश्क (यौवन)
इश्क (यौवन)
निज रूप यौवन का प्रिये
दर्पण में हैं निहारती
कर सोलहो श्रृंगार सज
छवि रूप को हैं संवारती।
मनुहार प्रियतम आस ले
कजरारे कातिल हैं नयन
निज रूप छवि को बिलोकती
मदमस्त यौवन सा उपवन।
हर्षित हैं मन पुलकित नयन
चित्त विरह में पागल हुए
आस संजोए मिलन की
कली पे भ्रमर घायल हुए।
यह रूप यौवन का समर्पण
हर श्वास प्रियतम के लिए
मैं वारि बार हजार जाऊं
हर आस प्रियतम के लिए।।

