इन्तेजार....
इन्तेजार....
इस मनमे आशाओं का दिएँ जलाके
सारे गम की दर्दे सिनेमे छुपाके
बहती हुई ये आंसुओं को पीके
ओठों पे छोटीसी ये मुस्कान लाके
कबसे बैठे है हम इन्तेजार करके।
ये इन्तेजार भी बड़ा सताता है
कभी कभी ये आईना दिखाता है
कभी खोयेहूए अतीत को बुलाता है
कभी सोएहूए सपनो को जगाता है
कभी उम्र से पहचान करवाता है।
पलक झपक के जब देखते है
रिश्ते नाते सब अपनी जगा है
ये समाज अभी बदल गया है
सारे रीती रीवाज भूल गये है
फिर भी उम्मीद की इन्तेजार है।
वो दिन फिर जरूर लौट आएगा
रिश्ते नतों की फिर कदर होगा
प्यार और सम्मान सबका मन्त्र होगा
खोयाहूआ अतीत फिर तो लौट आएगा
ये आइना तब उसे बर्तमान कहेगा।
फिरसे सपने अपनी जरूर पुरे होगा
सारे बुराई के अँधेरा मिट जाएगा
दिवाली के दिएँ जब जलते रहेगा
हर रोज फिर हमारे तीव्हार होगा
ये लम्बी इन्तजार फिर रन्ग लाएगा।
