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saru pawar

Children

4  

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Children

हवाएँ क्या बिगड़ गई

हवाएँ क्या बिगड़ गई

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आज कल बदला बदला सा बचपन है              

कही खो गई, इन्सानियत, गुमशुदा सी भावनाएँ

सहयोग भी नजर नही आता कही खो गई मासुमियत     

हाथ मे है खिलौना इनके जिसने छिना है बचपन,


भुल गये बच्चे रिश्ते और रिश्तों की ऐहमियत    

कहाँ आंगन है सुना, गलियाँ भी शांत सी         

खेलते बच्चे नहिं, उदास सी है ---                

जेहरीलीसी कुछ हवा है, खेलते बंदुकों से,           


मारते फिरते कितनों को ऐ अपनी गनो से     

दुर है इनसे मैंदा क्या,झुले भी नही ये झुलते       

अक्सर मोबाईल को सामने रखते हुँऐ ही ऐ जिते       

कौन है बगल में बैठा, क्या माँ बिमार है         


जरूरत है किसीको मेरी क्या, इनसे ये अनंजान है  

कोसो दूर है दोस्त इनके कम नही हजारों (--M/--k)है                                

घंटो करते चँटिग उनसे, माँबाप इनकी आवाज को तरसे

क्या संस्कार हमारे पहुँचे नहीं इनके जेहन तक        


क्यों हार गई माँ "सुधरों बच्चों अभी तो "ऐ केहक  

घर में दादी/नानी नहीं आज कल कहानियाँ जो सुनायें

कौन फिर इनकों राम और कृष्णा जैसा बनाऐ

पसंद इनकी KGF है, कैसे रहे फिर ऐ मासुम        


कहाँ सुनते है ये बापु और नेताजी की धून        

गुनगुनाते अंग्रेजी या फिर कोरियन गाना ऐ          

इनको नही पता गान कोकिला है लता हमारे जान है

कैसे जिते, क्या है खाते, सब विदेश की है बाते


बरबद हो रहीं इस पिढीं को हम नहीं क्यों रोंक पाते   

बिगडीं इन हवाओं से हम इन्हे नहीं बचा अब पातें      

है गुजारीश यहीं के अब रब इन्हें सही राह दिखा दे

अच्छे बुरे की समझ दे और                     

अपने रिश्तों की अहमियत बता दे।


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