होली
होली
ये दूरियां , मजबूरियां
न कर सकेंगी दूर हमको ।
लगाया था जो रंग कभी
उसका नूर अब तक बाकी है ।
मन में है छवि तुम्हारी
ओज उसका मुखड़े पर है ।
संग में खेले थे जो होली
खुमार उसका अब तक है ।
खेलूं मैं क्यों गैरों के संग होली
जब , बसेरा तुम्हारे दिल में है ।
रख लो गुलाल सीने पर जरा सा
होली संग मेरे मना लो तुम ।
उठाओ पिचकारी खुद को भींगा लो
मेरा भी तन मन भींग जाएगा ।
तुम यमुना पार , हूं मैं गंगा तीरे
फिर भी मिलन हो जाएगा ।
पी लो जरा सा भांग का शर्बत
थोड़ा गुलाल लगा लो तुम ।
दर्पण में मुझको निहारो तुम
संग मेरे होली मना लो तुम ।

