हमसफ़र
हमसफ़र
उदास है राहे विरान है मंज़िलें
बिना हमसफ़र कोई कैसे जाये !
ज़िन्दगी का सफ़र के ै ये लम्बा सफ़र,
तन्हा रह कोई कैसे ?किस कदर !
१ थामा था हमने सात जन्मों के लिए,
सात कदम भी न गुजरे और चल भी दिए !
बिना हमसफ़र.......
वो वादा इक दूजे की बाँहों में,ज़िन्दगी गुज़ारने का
वो वादे,वो क़समें,वो प्रीत और वफ़ा की रस्में
निभाते रहे हम रस्में वफ़ा,
हो के बेवफ़ाए ज़िन्दगी चल भी दिए !
बिना हमसफ़र.........
आँख खुली भी न थी और टूट गए सपने,
दो पल जी भी पाए तुम्हारे आग़ोश में,
छुड़ा कर अपना दामन हमसे चल भी दिए
बिना हमसफ़र........
वो रात सुहागों वाली वो रात मुरादों वाली,
तुम्हारी प्रीत की थी जो मेरे गालों पर लाली
सुहाग की वो लाल चुनरियाँ ओढ़ भी न पाए,
तुम विधवा का सफ़ेद कफ़न ओढ़ा कर चल भी दिए !
बिना हमसफ़र कोई कैसे दीये ?

