STORYMIRROR

Devendra Singh

Tragedy

4  

Devendra Singh

Tragedy

हम कितने आज़ाद हुए हैं?

हम कितने आज़ाद हुए हैं?

1 min
390

एक प्रश्न रह रह उठता है हम कितने आज़ाद हुए हैं

जाति न छूटी, द्वेष न टूटा घर कितनें आबाद हुए हैं?

कल लड़ते थे ज़रीदोज से, अब लड़ते हैं श्वेतपोश से

निकले थे जिस बर्बादी से, उतने फिर बर्बाद हुए हैं।

एक प्रश्न रह रह उठता है हम कितने आज़ाद हुए हैं।।


आडम्बर से हुई लड़ाई पीछा उससे छुड़ा न पाए,

जिस खंडहर से चले निकल के,लौटके फिर से उसमे आये

कसमें खायीं भारत माँ के पूतों की रक्षा करने की

भरा नही जब पेट कहीं से तब उस मां के बच्चे खाये

देख दुर्दशा निज नयनों से हम कितने नासाज़ हुए हैं!

एक प्रश्न रह रह उठता है हम कितने आज़ाद हुए हैं।।


संविधान वर्णित बातों का ध्यान नही रक्खा जाता है

मक्कारी का, बेईमानी का स्वाद रोज चक्खा जाता है

नियमों को रिश्वत की गठरी में नित प्रति बांधा जाता है

इन नियमों को नेताओं के घर गिरवी रक्खा जाता है

इन कर्मों से बेईमानों के मयख़ाने आवाद हुए हैं 

एक प्रश्न रह रह उठता है हम कितने आज़ाद हुए हैं।।


देशी घी की बातें करते मिलता सरसों का तेल नहीं

जब भी सत्ता से प्रश्न करो, कहते बच्चों का खेल नहीं

अब बहुत हुए झूठे वादे, मीठी बातों के रसगुल्ले

ये देश हमारी सम्पति है, कोई बिग बाजार की सेल नहीं

जो सेल समझ के बेंचे हो, इससे हम बर्बाद हुए हैं

एक प्रश्न रह रह उठता है हम कितने आज़ाद हुए हैं?


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy