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Shailaja Bhattad

Abstract


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Shailaja Bhattad

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हिंदी

हिंदी

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अपनों को पराया करने की प्रथा पुरानी है।

न सर चढ़ाने की न सर से उतारने की ।

साथ चलाने की प्रथा आजमानी है।

हिंदी कहलाने में सहजता दिखानी है ।

हिंदी की गरिमा बढ़ानी है।


अ से अज्ञानी को ज्ञ से ज्ञानी बनाती।

अपनों को पराया करने की प्रथा पुरानी है।

न सर चढ़ाने की न सर से उतारने की ।

साथ चलाने की प्रथा आजमानी है।

हिंदी कहलाने में सहजता दिखानी है ।

हिंदी की गरिमा बढ़ानी है।


अ से अज्ञानी को ज्ञ से ज्ञानी बनाती।

हिंदी हमें संस्कारी बनाती।

हमें संस्कारी बनाती।


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