Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

Mayank Kumar 'Singh'

Abstract

4.9  

Mayank Kumar 'Singh'

Abstract

माँ

माँ

1 min
517


दबाव में जिया जिंदगी

फिर भी यार मैं खुश हूं

कितने अपने थे दोस्त पहले

लेकिन आज रोज खुश हूं

किसी ने सच कहा है न

"माँ "ही हैं संसार में फरिश्ता

जब कभी दुखी होता हूं

माँ के पास होता हूं !

मेरे माथे पर,

उसके हाथ रखने से

बड़ा सुख मिलता है

जब कभी दुनिया की

भीड़ ने थकाया

माँ ने अपने आंचल

की छांव में सुलाया

इसलिए अब रोज खुश हूं !!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract