हिंदी
हिंदी
ह से हिंदी ह से ही हम
फ़िर क्यों इसे आंकते कम
अंग्रेजी नहीं आने पर आंँखें नम
हिंदी बोलने पर क्यों आती शर्म
पहचान है देश की ह से हिन्दुस्तानी
मिटाते क्यों जा रहे है हिंदी की निशानी
स से संस्कृति है हमारी स से संसार हमारी
फ़िर भेद क्यों है जीवन में नर नारी के
अ से आज़ाद देश के हम है वासी
म से महान भ से भारत के है निवासी।
