STORYMIRROR

SURYAKANT MAJALKAR

Tragedy

4  

SURYAKANT MAJALKAR

Tragedy

धूप-छाँव

धूप-छाँव

1 min
164

तुम सामने हो मगर बात होती नहीं,

छत एक ही मगर मुलाकात होती नहीं,


रिश्तों में नोंकझोंक होती है हमेशा,

हमेशा के लिए रिश्तों में दरार होती नहीं,


एक साथ चले हैं धूप-छाँव में हमदम,

अब राह-ए-जिंदगी अकेली कटती नहीं,


जिंदगी का ख़ालीपन हमसे न पूछो,

किसको ये सोचने की भी आदत होती नहीं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy