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SURYAKANT MAJALKAR

Abstract Tragedy

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SURYAKANT MAJALKAR

Abstract Tragedy

हे जीवन !

हे जीवन !

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आरंभ से अंतः तक,
व्यंग से छंद तक,
तन से मन तक,
अस्तित्व से याद तक,
मोह से तपश्चर्यातक,
शंका से समाधानतक,
धुत्कार से स्वीकारतक,
बात से 'चुप्पी' तक,
बस कारण तुम्ही हो जीवन..
जो समझ न पाया।
©सुर्यांश     


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